विद्यार्थियों के व्यवहार में सद्वृत का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन

 

अंकित तिवारी

समाजशास्त्रद्ध प्रोण्चन्द्र शेखर पाण्डेय सिद्धांत दर्शन विभाग एआयुर्वेद संकाय, BHU

*Corresponding Author E-mail: ankit1993@bhu.ac.in

 

ABSTRACT:

समाजशास्त्र में सामाजिक - प्रतिमान के अध्ययन का  विशेष महत्व है क्योंकि यह  ही सामाजिक संबंधों को नियमित करते हैं और समाज व्यवस्था को  स्थायित्व प्रदान करते हैं हम सामाजिक प्रतिमाओं के अध्ययन के द्वारा किसी समाज में व्यवस्था का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं | सामाजिक तथ्यों  के आधार पर ही हम किसी मानवीय व्यवहार को उचित या अनुचित ठहरा सकते हैं। मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रायः समाज द्वारा स्वीकृत तरीकों को अपनाता है ।

 

KEYWORDS: प्रतिमान, समाजशास्त्र, प्रवृत्तियां, सांस्कृतिक.

 

 


प्रस्तावना

सृष्टि के आरंभ काल से ही मनुष्यों  ने स्वयं की आवश्यकताओ की पूर्ति करने के लिए सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने का प्रयास करते रहे हैं। समाज निरंतर गतिशील एवं परिवर्तनशील है।  कहा गया है कि, प्रकृति  परिवर्तनशील  है| इसका प्रभाव समाज पर भी प्रत्यक्ष एवं  परोक्ष रूप से पढ़ता रहा है, जिसके कारण मनुष्यों की व्यवहार में परिवर्तन होता रहा है।

 

आरंभ  से ही समाज ने मनुष्यों के व्यवहार पर अनेक प्रकार से प्रतिबंध स्थापित किए, जिसके फलस्वरुप समाज में साम्यता  की स्थिति बनी रही है । इन्हीं प्रतिबंधों को सामाजिक- प्रतिमान के नाम से जाना गया | सामाजिक- प्रतिमान एक प्रकार के आदर्श व्यवहार होते हैं। सामाजिक प्रतिमान को समाजिक मानदंड अथवा सामाजिक आदर्श नियम भी कह  सकते  हैं। समाजशास्त्र में सामाजिक - प्रतिमान के अध्ययन का  विशेष महत्व है क्योंकि यह  ही सामाजिक संबंधों को नियमित करते हैं और समाज व्यवस्था को  स्थायित्व प्रदान करते हैं हम सामाजिक प्रतिमाओं के अध्ययन के द्वारा किसी समाज में व्यवस्था का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं | सामाजिक तथ्यों  के आधार पर ही हम किसी मानवीय व्यवहार को उचित या अनुचित ठहरा सकते हैं। मानव में मूल रूप में  वह सभी प्रवृत्तियां  पाई जाती हैं ,जो पशुओं में पाई जाती हैं, किंतु पशुओं का व्यवहार शारीरिक आवश्यकताओं से अधिक प्रभावित होता है| मानव का व्यवहार अंशतः शारीरिक आवश्यकताओं और अंशतः सांस्कृतिक मूल्यों द्वारा भी नियामित होता है|  मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रायः समाज द्वारा स्वीकृत तरीकों को अपनाता है ।

वर्तमान-समय में व्यक्ति के समक्ष सामाजिक- व्यवस्था के साथ -साथ अपने स्वास्थ्य को भी बचाने के चुनौती बड़ी है |

 

(W.H.O.) ने सन् 1948 में स्वास्थ्य या आरोग्य की निम्नलिखित परिभाषा दी है।

1) दैहिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना (समस्या-विहीन होना) ही स्वास्थ्य है।

2) किसी व्यक्ति की मानसिक, शारीरिक और सामाजिक रुप से अच्छे होने की स्थिति को स्वास्थ्य कहते हैं।। 

 

स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों की अनुपस्थिति का नाम नहीं है। हमें सर्वांगीण स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान  होना बहुत आवश्यक है। स्वास्थ्य का अर्थ विभिन्न लोगों के लिए अलग-अलग होता है। लेकिन, अगर हम एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण की बात करें, तो, अपने आपको स्वस्थ कहने का यह अर्थ होता है कि, हम अपने जीवन में आनेवाली सभी सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियों का प्रबंधन करने में सफलतापूर्वक सक्षम हैं । वैसे तो आज के समय मे अपने आपको स्वस्थ रखने के ढेर सारी आधुनिक तकनीक मौजूद है, लेकिन यह  सब  उतनी अधिक कारगर सिद्ध  नहीं हो पा रही हैं। इस हेतु प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति  की कुछ विशिष्ठ व्यवस्थाओ पर दृष्टि गयी ,जिनके विवेचन से यह तथ्य स्पष्ट होने लगा कि ,समग्र स्वास्थ की परिकल्पना ,इनके विना अधूरी है |

 

इन्ही व्यवस्थाओ  में एक है सद्वृत | सद्वृत का सर्वप्रथम उल्लेख आयुर्वेदिक ग्रन्थ चरक संहिता में प्राप्त होता है | सद्वृत्त  कुछ एसे मानक है जिनके पालन से व्यक्ति मानसिक,शारीरिक और सामाजिक रुप से अच्छे स्वस्थ एवं सामाजिक जीवन  की स्थिति को प्राप्त कर सकता है |

 

शोध का महत्व – सद्वृत में वर्णित सभी नियम कुछ एसे आचार संहिताओ को बताते है जिसके पालन से व्यक्ति सम्पूर्ण स्वास्थ्य की कल्पना कर सकता है | क्यूंकि ये नियम व्यक्ति के मन को नियंत्रण में करने में मददगार सिद्ध है|मन के बारे में कहा गया है कि मन की चंचलता के कारण विभिन्न प्रकार की व्याधियां उत्पन्न होती है |इसलिए इस शोध को विद्यार्थियों पर किया गया| विद्यार्थीय जीवन एक ऐसा जीवन होता है जिसमे अनियमिता और निश्चिन्ता व्याप्त होती है|वर्तमान में तो ये सभी प्रकार के मानको के परे जा कर कार्य करते नजर आते है |इनका कुछ भी निश्चित नही होने के कारण विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याएं देखि जाती है |

 

शोध का उद्देश्य – इस शोध का उद्देश्य प्रमुख रूप से यह पता करना है कि

1.    कितने विद्यार्थी सद्वृत से अवगत है?

2.    कितनो ने इसका नाम सुन रखा है ?

3.    कितने इसका पालन करते है ?

 

शोध का क्षेत्र –विद्यार्थियों के व्यवहार में सद्वृत के ज्ञान का पता लगाने के लिए मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों से सर्वे करके जानकारी एकत्रित की |काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में लगभग 33000 छात्र/छात्राये पठन-पाठन के कार्य में लगे है |ये विद्यार्थी विभिन्न प्रान्त से आते है | जिनके संस्कृति और संस्कार में भी अंतर शुरू में देखा जाता है परन्तु समय के साथ- साथ ये भिन्नता को कम कर देते है |

 

शोध की प्राविधि – प्रस्तुत अनुसंधान के लिए शोधकर्ता ने सर्वेक्षण विधि का उपयोग करना उचित समझा क्योंकि यह विधि किसी क्षेत्र की तात्कालिक परिस्थितियों की जानकारी देती हैं। जिनके विश्लेषण से हम उन कारकों का पता लगा सकते हैं जो उस स्थिति के लिए उत्तरदायी हैं। इस प्रकार यह विधि हमें कार्य कारण सम्बन्धों को समझाने में सहायता करती हैं। "विद्यार्थियों के व्यवहार में सद्वृत का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन” में सद्वृत का  एक  मापन करने हेतु शोधकर्ता  ने सर्वेक्षण विधि को उपयुक्त समझा। शोध की परिस्थितियों को देखते हुए शोधकर्ता द्वारा सर्वेक्षण विधि का चयन किया गया।

 

शोध कार्य में प्रयुक्त निदर्शन - प्रस्तुत अध्ययन की पूर्ति हेतु शोधकर्ता  ने निदर्शन  चयन हेतु सर्व विद्या की राजधानी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के तीन संकाय कला संकाय , विज्ञान संकाय और वाणिज्य संकाय में अध्यनरत विद्यार्थियों   में से स्नातक अंतिम वर्ष और परास्नातक प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों को लिया गया जिनकी उम्र २०-२५ वर्ष के बीच में हो का चयन किया है। उपस्थिति के अनुसार 100 पुरुष विद्यार्थी एवं महिला विद्यार्थियों का चयन किया गया। इस प्रकार कुल निदर्शन के रूप में 100 पुरुष विद्यार्थी एवं महिला विद्यार्थियों का चयन किया गया। सदुपरान्त उन बालकों पर सद्वृत की स्वनिर्मित  अनुसूची सम्बन्धित प्रश्नावली को भरवाया  गया।

 

शोध उपकरण -

प्रस्तुत शोध में अध्ययन हेतु स्वनिर्मित प्रकार के उपकरण का चयन किया गया है जिसमे पांच खंड है प्रत्येक खंड में प्रश्नों की संख्या अलग अलग है |

 

परिणाम-सम्बधित शोध अध्ययन में शोधार्थी द्वारा तथ्यों के संकलन के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालयके समग्र में से 100 उत्तरदाताओ का चयन किया गया तथा उनसे प्राप्त जानकारियों को एकत्रकर तथ्यों का विशलेषण करके परिणाम प्राप्त किया गया है जिनको तालिका एवंग्राफ के माध्यम से  दर्शाया गया है-

 

प्रश्नावली के प्रथम खंड में पारिवारिक सूचनाये एवं मान्यतायो से सम्बंधित प्रश्नों को रखा है|

 

जिसमे प्रथम प्रश्न को परिवेश से सम्बंधित है|इसके लिए दो विकल्प दिए गये है नगरीय एवं ग्रामीण| विश्लेषण करने के लिए नगरीय को 1 एवं ग्रामीण को 2  मान दिए है| जिसको सारणी संख्या 1 में दिखया गया है 

 

सारणी संख्या 1.

 

Frequency

Percent

Valid Percent

Cumulative Percent

Valid

1

39

38.2

38.6

38.6

2

62

60.8

61.4

100.0

Total

101

99.0

100.0

 

Missing

System

1

1.0

 

 

Total

102

100.0

 

 

 

सारणी से ज्ञात होता है की उत्तरदाताओ में 38.6% विद्यार्थी नगरीय परिवेश में और 61.4% ग्रामीण परिवेश से विद्यार्थी आते है | 

 

इस प्रश्न में मैंने विद्यार्थियों से उनके आर्थिक स्थिति के संदर्भ में सवाल किये जिसके लिए मैंने 3 विकल्प रखे अमीर/मध्यम/गरीब रखे, जिसको विश्लेषण करने के लिए क्रमशः1,2,और 3 मान दिए है| जिसको मैंने सारणी  संख्या 3 में दिखाया है| 

 

सारणी संख्या 2

 

 

Frequency

Percent

Valid Percent

Cumulative Percent

Valid

1

9

8.8

8.9

8.9

2

76

74.5

75.2

84.2

3

16

15.7

15.8

100.0

Total

101

99.0

100.0

 

Missing

System

1

1.0

 

 

Total

102

100.0

 

 

 

उपरोक्त सारणी से ज्ञात होता है कि विश्वविद्यालय में 74.5% विद्यार्थी मध्यम परिवार से आते है 8.9% विद्यार्थी अमीर और 15.8% गरीब घर से सम्बंधित मिले है| इस प्रश्न में भी पारिवारिक मान्यताओ से सम्बंधित प्रश्न किया है की आपके परिवार में भूत –प्रेत पर विश्वास करते है? उतर में तीन विकल्प दिए गये हाँ, नही और कभी–कभी  जिनको विश्लेषण के लिए हाँ, नही और कभी –कभी  को क्रमशः1,2 और 3 मान दिया गया जिसको प्रतिशत में सारणी संख्या 5 में दिखया गया है | 

 

सारणी संख्या 3

 

 

Frequency

Percent

Valid Percent

Cumulative Percent

Valid

1

22

21.6

21.6

21.6

2

38

37.3

37.3

58.8

3

42

41.2

41.2

100.0

Total

102

100.0

100.0

 

 

सारणी संख्या 5 से ज्ञात होता है कि 21.6% विद्यार्थी के परिवार भूत प्रेत पैर विश्वास करते है, 37.3% विद्यार्थियों के परिवार के लोग नही मानते जबकि 41.2%परिवार एसे है जो कभी कभी मानते है कभी नही मानते है|

 

प्रश्नावली के दुसरे खंड में मैंने सद्वृत से समन्धित प्रश्नों को पूछा है जिसमे पहला प्रश्न है कि आप सद्वृत को जानते है कि नही जिसके विश्लेषण को सारणी संख्या 6 में दिखाया गया है |

 

क्या आप ने सद्वृत के बारे मे सुना है? इस प्रश्न के लिए उत्तर में विकल्प के लिए हाँ और नही को रखा है सभी उत्तरदाता के उत्तर का विश्लेषण करने के लिए हाँ को 1 और नही को 2 मान दिया है |

जिसको मैंने सारणी संख्या 6  में रखा है

 

सारणी संख्या  4

 

 

Frequency

Percent

Valid Percent

Cumulative Percent

Valid

1

33

32.4

33.3

33.3

2

66

64.7

66.7

100.0

Total

99

97.1

100.0

 

Missing

System

3

2.9

 

 

Total

102

100.0

 

 

 

प्रश्नावली के इस खंड में मैंने मानसिक सद्वृत से सम्बंधित प्रश्नों को पूछा है जिसमे पहला प्रश्न है कि –

क्या आप कार्यो को विवेक पूर्वक करते है? उतर में तीन विकल्प दिए गये हाँ, नही और कभी –कभी  जिनको विश्लेषण के लिए हाँ, नही और कभी –कभी  को क्रमशः1,2 और 3 मान दिया गया जिसको प्रतिशत में सारणी संख्या 7  में दिखया गया है |

 

सारणी संख्या 5

 

 

Frequency

Percent

Valid Percent

Cumulative Percent

Valid

1

70

68.6

70.0

70.0

2

4

3.9

4.0

74.0

3

26

25.5

26.0

100.0

Total

100

98.0

100.0

 

Missing

System

2

2.0

 

 

Total

102

100.0

 

 

 

सारणी संख्या 7 से ज्ञात होता है कि 70.00% विवेक से कार्य करते है 4 % लोग विवेक से कार्य नही करते है और 26% लोग कभी कभी कभी करते है|

 

उपकरण के इस खंड में चरित्र सम्बंधित सद्वृत के प्रश्नों को मैंने रखा है क्या आप सत्यनिष्ठ एव शांतिप्रिय है ? उतर में तीन विकल्प दिए गये हाँ, नही और कभी –कभी  जिनको विश्लेषण के लिए हाँ, नही और कभी –कभी  को क्रमशः1,2 और 3 मान दिया गया जिसको प्रतिशत में सारणी संख्या 23 में दिखया गया है|

 

सारणी संख्या 6

 

 

Frequency

Percent

Valid Percent

Cumulative Percent

Valid

1

55

53.9

56.1

56.1

2

20

19.6

20.4

76.5

3

23

22.5

23.5

100.0

Total

98

96.1

100.0

 

Missing

System

4

3.9

 

 

Total

102

100.0

 

 

 

सारणी से ज्ञात होता है कि हाँ में उत्तर देने वालों की संख्या 56.1% है, नही में उत्तर देने वालों की संख्या 20.4% है और कभी कभी में उत्तर देने वालों की संख्या 23.5% है|

 

 

प्रश्नावली के इस खंड में मैंने सामाजिक सद्वृत से सम्बंधित प्रश्न किये गये है जिनका विश्लेषण निम्न सारणी की अंतर्गत है –

 

क्या आप अतिथियों, आचार्योबुजुर्गो, कुल तथा वय में श्रेष्ठ जनो का सम्मान करते है ? उतर में तीन विकल्प दिए गये हाँ, नही और कभी–कभी  जिनको विश्लेषण के लिए हाँ, नही और कभी –कभी  को क्रमशः1,2 और 3 मान दिया गया जिसको प्रतिशत में सारणी संख्या 33 में दिखया गया है |

 

 

सारणी संख्या 7

 

 

Frequency

Percent

Valid Percent

Cumulative Percent

Valid

1

87

85.3

88.8

88.8

2

5

4.9

5.1

93.9

3

6

5.9

6.1

100.0

Total

98

96.1

100.0

 

Missing

System

4

3.9

 

 

Total

102

100.0

 

 

 

सारणी से ज्ञात होता है कि हाँ में उत्तर देने वालों की संख्या 88.8% है, नही में उत्तर देने वालों की संख्या 5.1% है और कभी कभी में उत्तर देने वालों की संख्या 6.1% है|

 

प्रश्नावली के इस खंड में धार्मिक सद्वृत से सम्बंधित प्रश्नों को पूछा गया है जिसका विश्लेषण निम्न सारणी में दिया गया है –

 

क्या आप धर्म पर विश्वास करते हैं ? उतर में तीन विकल्प दिए गये हाँ, नही और कभी–कभी  जिनको विश्लेषण के लिए हाँ, नही और कभी –कभी  को क्रमशः1,2 और 3 मान दिया गया जिसको प्रतिशत में सारणी संख्या 60 में दिखया गया है|

 

सारणी संख्या 7

 

 

Frequency

Percent

Valid Percent

Cumulative Percent

Valid

1

77

75.5

78.6

78.6

2

10

9.8

10.2

88.8

3

11

10.8

11.2

100.0

Total

98

96.1

100.0

 

Missing

System

4

3.9

 

 

Total

102

100.0

 

 

 

सारणी से ज्ञात होता है कि हाँ में उत्तर देने वालों की संख्या 78.6% है, नही में उत्तर देने वालों की संख्या 10.2% है और कभी कभी में उत्तर देने वालों की संख्या 11.2% है|

 

प्रशंवाली के इस खंड में वैक्तिक सद्वृत से सम्बंधित प्रशनो को पुचा गया है जिसका सारणीगत विश्लेषण निम्नवत है –

 

क्या आप समय पर सोते है? उतर में तीन विकल्प दिए गये हाँ, नही और कभी –कभी  जिनको विश्लेषण के लिए हाँ, नही और कभी –कभी  को क्रमशः1,2 और 3 मान दिया गया जिसको प्रतिशत में सारणी संख्या 68 में दिखया गया है|

 

सारणी संख्या 8

 

 

Frequency

Percent

Valid Percent

Cumulative Percent

Valid

1

25

24.5

25.5

25.5

2

33

32.4

33.7

59.2

3

40

39.2

40.8

100.0

Total

98

96.1

100.0

 

Missing

System

4

3.9

 

 

Total

102

100.0

 

 

                                

सारणी से ज्ञात होता है कि हाँ में उत्तर देने वालों की संख्या 25.5% है, नही में उत्तर देने वालों की संख्या 33.7 है और कभी कभी में उत्तर देने वालों की संख्या 40.8% है|

 

निष्कर्ष –

प्रस्तुत शोध से यह ज्ञात होता है की वर्तमान में सद्वृत का सम्पूर्ण पालन किसी के लिए भी संभव नही है |मेरे द्वारा किये गये शोध में कई प्रश्न थे परन्तु सभी को यहाँ प्रस्तुत नही कर सकता| वर्तमान का समाज आधुनिक समाज है|यहाँ व्यक्ति अपने सम्पूर्ण व्यवहार को उपयोगिता के अनुसार ही करता है |जिसमे स्वास्थ्य को जितना अधिक ध्यान देना चाहिए उतना ही अन्य कामो पर ध्यान देता है उसके लिए कार्य आवश्यक है| सद्वृत एक आदर्श स्थिति है जिसको पालन करने से व्यक्ति संत बनने की और अग्रसर होता है| सद्वृत्त पालन का महत्व को आयुर्वेद शास्त्र में निम्न लिखित बिंदुओं के द्वारा समझाया गया है –

·         सद्वृत्त पालन से आरोग्य एवं स्वस्थ जीवन की प्राप्ति होती है। सद्वृत्त पालन से मनुष्य सभी प्रकार के रोगों से मुक्त शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य के साथ स्वस्थ जीवन व्यतीत करता है।

·                 सद्वृत्त पालन से मनुष्य को सौ वर्षों की स्वस्थ आयु प्राप्त होती है जिसके विषय में वर्णन करते हुए वेद में ईश्वर से प्रार्थना की गयी है - ओम तस्यचक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमु´चरत्। पश्चेम शरद: शतं जीवेम शरद: शतं श्रृणुयाम शरद: शतं प्र ब्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतं भूयच्श्र शरद: शतात् ।। (यजुर्वेद) अर्थात हे प्रभो, हम आपको सौ वर्ष देखें, आपकी आज्ञा में सौ वर्ष जीवें, आपके नाम का सौ वर्ष व्याख्यान करें, सौ वर्ष की आयु भर पराधीन न हों और योगाभ्यास से सौ वर्ष से भी अधिक आयु हो तो इसी प्रकार विचरें अर्थात इसी प्रकार आचरण और व्यवहार करें

·         सद्वृत्त पालन से मनुष्य को साधु पुरुषों में पूजनीय स्थान की प्राप्ति होती है अर्थात मनुष्य में अच्छे गुण एवं उत्तम संस्कारों का उदय होता है जिसके फलस्वरुप मनुष्य का सामाजिक उत्थान होता है एवं समाज के सत्पुरुषों में सम्मान की प्राप्ति होती है। 

·         सद्वृत्त पालन से मनुष्य को इस लोक में यश एवं ख्याति की प्राप्ति होती है अर्थात मनुष्य की यश एवं किर्ति की सुगन्धी चारों दिशाओं में फैलती है।

·         सद्वृत्त पालन से मनुष्य में मानवीय गुणों जैसे प्रेम, करुणा, दया, सहानुभूति एवं परोपकार का विकास होता है। मनुष्य स्वार्थ एवं सर्कीणता के तुच्छ भावों से ऊपर उठकर उच्च मानसिक क्षमता एवं श्रेष्ठ आत्मबल का धनी बनता है। 

·         सद्वृत्त पालन से मनुष्य इस लोक में सौ वर्षों की स्वस्थ आयु के का भोग करने के उपरान्त सद्गति को प्राप्त होता हुआ परलोक भी अच्छे फलों को प्राप्त करता है अर्थात सद्वृत्त पालन से मनुष्य का यह लोक एवं परलोक दोनों ही सुधरते हैं।

 

REFERENCES:

1.       Charak Samhita with Charak Chandrika Hindi commentary, by Dr. Brahmanand Tripathi and Dr. Ganga Sahay Pandey. Chaukhamba Surbharti Prakashan, Sutra Sthana, 2007; 8(17): 196.

2.       Charak Samhita with Charak Chandrika Hindi commentary, by Dr. Tripathi Brahmanand, Chaukhamba Surbharti Prakashan, Sutra Sthan, 2007; 8(18): 197.

3.       Charak Samhita with Charak Chandrika Hindi commentary, by Dr. Tripathi Brahmanand, Chaukhamba Surbharti Prakashan, Sutra Sthan, 2007; 8(31): 206.

4.       Charak Samhita with Charak Chandrika Hindi commentary, by Dr. Brahmanand Tripathi and Dr. Ganga Sahay Pandey. Chaukhamba Surbharti Prakashan, Sutra Sthana, 2007; 8(17): 196.

5.       Charak Samhita with Charak Chandrika Hindi commentary, by Dr. Tripathi Brahmanand, Chaukhamba Surbharti Prakashan, Sutra Sthan, 2007; 8(19): 198.

6.       Sushruta Samhita. Ambikadutta Shastri, editor. 2ndedition. Varanasi: Chaukhamba Sanskrit Sansthan. Chikitsa Sthana, 2007; 24(75): 137.

7.       Sushruta Samhita. Ambikadutta Shastri, editor. 2ndedition. Varanasi: Chaukhamba Sanskrit Sansthan; 2007. Chikitsa Sthana, 24(77): 137.

8.       Charak Samhita with Charak Chandrika Hindi commentary, by Dr. Tripathi Brahmanand, Chaukhamba Surbharti Prakashan, Sutra Sthan, 2007; 7(32): 175.

9.       Charak Samhita with Charak Chandrika Hindi commentary, by Dr. Tripathi Brahmanand, Chaukhamba Surbharti Prakashan, Sutra Sthan, 2007; 7(33): 176 Swasthayvrit vigyan, 1st edition, by Prof. Ram Harsh Singh.

 

 

 

Received on 24.02.2022            Modified on 18.03.2022

Accepted on 08.04.2022             © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2022; 10(1):23-30.